औषधीय गुणों की खान है देव वृक्ष पारिजात
लखनऊ। हिन्दू धर्म ग्रंथों में देव वृक्ष की संज्ञा से नवाजे गए दुलर्भ प्रजाति का पारिजात वास्तव में औषधीय गुणों की खान है। आयुर्वेद में इस वृक्ष के तने से लेकर शिखा तक में जटिल और असाध्य रोगों के निदान का वर्णन किया गया है। अपनी नायाब खूबसूरती और विशेष गुणों के कारण यह वृक्ष सदियों से लोगों के आकर्षण और कौतूहल का केन्द्र बना हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस वृक्ष को संरक्षित घोषित किया है। राजधानी लखनऊ और बाराबंकी में पारिजात के वृक्ष को निहारने के लिए हररोज बडी तादाद में लोग पहुंचते है।
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लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान में पारिजात को देखने के लिए दर्शक खासतौर पर आते हैं। हिन्दू पुराणों में पारिजात को देव वृक्ष की संज्ञा से नवाजा गया है। मान्यता है कि इस वृक्ष को स्पर्श करने मात्र से ही शरीर की थकान छू मंतर हो जाती है। प्राणि उद्यान के निदेशक राजेन्द्र कुमार सिंह ने को बताया कि प्राणि उद्यान में पारिजात के चार वृक्ष हैं। वन्यजीवों को निहारने आने वाले दर्शकों में कई ऐसे होते है जो विशेष रूप से यहां पारिजात वृक्ष को देखने के लिए आते हैं। सिंह ने बताया कि आयुर्वेद में देव वृक्ष को खास स्थान दिया गया है।
पारिजात में औषधीय गुणों का भण्डार है। पारिजात बावासीर के लिए रामबाण औषधि है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाए तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है।पारिजात के फूल हदय रोग के निदान के लिए भी उत्तम माने जाते हैं। इनके फूलों का या रस का सेवन करने से हृदय रोग से बचा जा सकता है। पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खांसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोग ठीक हो जाते है।
उन्होंने बताया कि पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोपल को अगर पांच काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करें तो स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहां हेयर टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। गुर्दे के रोगों में यह पेड़ लाभकारी होता है। इस पेड़ की छाल में पानी की मात्रा बहुतायत होती है जो मलेरिया ज्वर में उपयोगी होता है। इस वृक्ष का फल लम्बा, भूरा होता है और इसे चाव से खाया जाता है। इसका गूदा पाचक तथा स्वाद में खट्टा होता है।
हिन्दू धर्म ग्रंथो में पारिजात के बारे में कई किवदंतिया प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी। जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। हरिवंश पुराण के अनुसार पारिजात के अदभुद फूलों को पाकर सत्यभामा ने भगवान कृष्ण से जिद की कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। -एजेंसी
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